Wednesday, November 22, 2017

UP : हिंदू 'आस्था को नमन' पर CM योगी के दावों पर सबाल उठाती एक्टिविस्ट संजय की RTI

लखनऊ /22 नवंबर 2017.......................
आबादी के हिसाब से देश के सबसे बड़े सूबे उत्तर प्रदेश मैं इस समय एक संत सत्ता पर काबिज हैं l  यूपी के वर्तमान सीएम योगी आदित्यनाथ अपनी कट्टर हिंदूवादी छवि के लिए जाने जाते रहे हैंl  योगी के मुख्यमंत्री बनने के बाद प्रदेश की हिंदू जनसंख्या को उनसे आशाएं और अपेक्षाएं भी उनकी छवि के अनुरूप ही बहुत अधिक थीं और योगी ने सरकार बनाने के बाद इस तरह के संकेत भी दिए थे कि वह हिंदू आस्था से जुड़े मुद्दों पर अपने हिंदू समर्थक  कट्टर रुख को बरकरार रखेंगे लेकिन क्या योगी बास्तव में हिन्दू आस्था से जुड़े मुद्दों पर बास्तव में संवेदनशील हैं या सत्ता में आने के बाद योगी भी एक ट्रेडिशनल राजनेता की तरह हिन्दुओं को वादों की लॉलीपॉप थमाते जा रहा हैं जिनका यथार्थ के धरातल पर कोई असर अब तक दिखाई नहीं दे रहा है l 

To Download original RTI,reply & other documents, please click this weblink


यह चुभता हुआ सबाल इसलिए उठ रहा है क्योंकि यूपी की राजधानी लखनऊ के फायर ब्रांड आरटीआई एक्टिविस्ट और इंजीनियर संजय शर्मा की एक  आरटीआई पर  आये जवाब से यह चौंकाने वाला खुलासा हुआ है कि  बीते 19 मार्च को यूपी की सत्ता संभालने के बाद योगी ने हिंदू 'आस्था को नमन' करने की बात कहते हुए दावे तो बड़े बड़े किए हैं लेकिन तीन चौथाई साल बीत जाने पर भी योगी सरकार अभी तक हिंदू आस्था से जुड़े मुद्दों पर कोई ठोस जमीनी कार्यवाही नहीं कर पाई है l

देश के नामचीन समाजसेवियों में शुमार होने वाले संजय शर्मा बताते हैं कि सूचना एवं जनसंपर्क विभाग उत्तर प्रदेश ने योगी सरकार के 100  दिन पूरे होने पर '100  दिन विश्वास के' शीर्षक से एक पत्रिका का प्रकाशन किया था जिसमें हिंदू आस्था को नमन की बात कहते हुए कैलाश मानसरोवर यात्रियों के अनुदान की बढ़ोत्तरी ,गाजियाबाद में कैलाश मानसरोवर भवन के निर्माण, अयोध्या में भजन संध्या स्थल के निर्माण, चित्रकूट में परिक्रमा पथ के पुनर्विकास एवं भजन संध्या स्थल के निर्माण, धर्मार्थ कार्य विभाग की वेबसाइट के शुभारंभ और सिंधु दर्शन के अनुदान को लेकर कई दावे किए गए थे जिनकी सत्यता परखने के लिए और इन क्षेत्रों में सरकार द्वारा घोषित की गई योजनाओं को अमली जामा पहनाने के लिए सरकार द्वारा की गई कार्यवाही की जमीनी हकीकत को परखने  के लिए उन्होंने बीते सितंबर की 21 तारीख को यूपी के मुख्य सचिव के कार्यालय में एक आरटीआई दायर कर 8 बिंदुओं पर सूचना मांगी थी l  मुख्य सचिव कार्यालय के जन सूचना अधिकारी ने संजय की  यह आरटीआई बीते  3 अक्टूबर  को उत्तर प्रदेश शासन के धर्मार्थ कार्य विभाग को अंतरित कर दी थी l धर्मार्थ कार्य विभाग के अनुभाग अधिकारी एवं जन सूचना अधिकारी विनीत कुमार ने बीते 15 नवंबर को पत्र जारी कर वरिष्ठ समाजसेवी संजय शर्मा को जो जानकारी दी है वह बेहद चौंकाने वाली हैं और योगी सरकार को कठघरे में खड़ा कर रही हैं l

समाजसेवी संजय को दी गई इस सूचना से यह बात सामने आ रही है कि यूपी के सीएम योगी आदित्यनाथ ने हिंदुओं की आस्था से जुड़े मुद्दों पर दावे तो बड़े बड़े किए हैं पर लगभग तीन चौथाई साल बीत जाने पर भी योगी आदित्यनाथ की सरकार अभी तक इन योजनाओं को अमली जामा नहीं पहना पाई है l  विनीत कुमार ने संजय को बताया है कि  कैलाश मानसरोवर यात्रा के अनुदान के भुगतान की कार्यवाही अभी भी प्रक्रियाधीन एवं परीक्षण आधीन हैl  अयोध्या में भजन संध्या स्थल के निर्माण हेतु वर्तमान वित्तीय वर्ष में अब तक कोई भी धनराशि अवमुक्त न किए जाने, चित्रकूट में परिक्रमा पथ एवं भजन संध्या स्थल के निर्माण हेतु वर्तमान वित्तीय वर्ष में अब तक कोई धनराशि अवमुक्त न किए जाने, धर्मार्थ कार्य विभाग की वेबसाइट को बनाने हेतु वर्तमान वित्तीय वर्ष में अब तक कोई धनराशि अवमुक्त न किए जाने, सिंधु दर्शन के लिए अनुदान पाने वाले यात्रियों को वर्तमान वित्तीय वर्ष में अब तक कोई धनराशि अवमुक्त न किए जाने और रामलला अयोध्या राम मंदिर के त्रिपाल पर वर्तमान वित्तीय वर्ष में कोई धनराशि अवमुक्त न किए जाने की सूचना भी विनीत कुमार ने संजय को दी है l


अपने बेबाक रुख के चलते यूपी की शान कहे जाने वाले समाज सेवी संजय का कहना है की सरकार द्वारा छपाई गई पुस्तिकाओं में बिना अमल में लाए हुए योजनाओं के वारे में बड़ी-बड़ी बातें करते हुए उन्हें अपनी उपलब्धियां बताना  सरकारों को शोभा नहीं देता है l संजय का कहना है कि राजतंत्र में भाट और चारण संस्कृति थी जिसमें भाट -चारण अपने मालिक राजा से इनाम पाने की चाहत में उनकी शान में झूठे कसीदे गढ़ते थे लेकिन लोकतंत्र में सरकार का मुखिया भी जनता का नुमाइंदा ही होता है सरकार पूरी जनता के लिए ही होती है और इसीलिये सरकार और मुख्यमंत्री को केवल अपनी वही उपलब्धियां जनता के बीच लेकर जानी चाहिए जिनको उसने वास्तव में जमीनी स्तर पर आम जनता को उपलब्ध करा दिया हो l संजय का कहना है कि वह उत्तर प्रदेश के सूचना एवं जनसंपर्क विभाग को इस भाट-चारणी संस्कृति से मुक्त करा कर सरकार की तथ्यपरक उपलब्धियां ही प्रकाशित करने की अपनी अपेक्षा रखने वाला एक पत्र यूपी के सीएम और राज्यपाल को भेजने जा रहे हैl

Tuesday, November 14, 2017

बाल श्रम को न रोक पाना राजकीय शर्म : संजय शर्मा l

 बाल दिवस पर विशेष -   लखनऊ की 77 परसेंट आबादी के बराबर बाल श्रमिक हैं यूपी में l यूपी के 7 परसेंट से अधिक बच्चे कर रहे हैं बाल श्रम l योगी सरकार में शासन स्तर पर बाल श्रम के मुद्दे पर नहीं हो पाई है कोई बैठक l  लखनऊ के फायरब्रांड समाज सेवी और इंजीनियर संजय शर्मा की आरटीआई से हुआ खुलासा  l


लखनऊ / 14 नवंबर 2017…………आज बाल दिवस है l आज के दिन पूरे प्रदेश में कई सरकारी आयोजन होंगे जिनमें क्या सत्ता पक्ष और क्या विपक्ष, जो कभी सत्ता में हुआ करता था ; सभी बच्चों के मुद्दों पर बड़ी बड़ी संवेदनशील बातें  कहेंगे पर जब सूबे  के इन नौनिहालों के लिए जमीनी स्तर  पर कुछ ठोस काम करने की बात आती है तो इन सभी राजनेताओं की कथनी-करनी का अंतर सामने आने लगता है l कुछ ऐसा ही खुलासा देश के जाने-माने समाजसेवियों में शुमार होने वाले लखनऊ के मानव अधिकार कार्यकर्ता और इंजीनियर संजय शर्मा की एक आरटीआई पर श्रम आयुक्त उत्तर प्रदेश के कार्यालय के समय परीक्षण अधिकारी और जन सूचना अधिकारी मोहम्मद अशरफ द्वारा दिए गए उत्तर से हो रहा है l

To Download original RTI & reply, please click this weblink http://sajagngonews.blogspot.in/2017/11/blog-post_16.html


बताते चलें कि समाजसेवी संजय ने बीते जून की 16 तारीख को यूपी के मुख्य सचिव के कार्यालय में एक आरटीआई अर्जी डालकर उत्तर प्रदेश में बाल श्रम निषेध एवं नियमन संशोधन अधिनियम लागू होने के बाद यूपी में बाल श्रम के मुद्दे पर प्रदेश सरकार द्वारा की गई कार्यवाही के सम्बन्ध में 8 बिंदुओं पर सूचना मांगी थी l मुख्य सचिव कार्यालय ने संजय की आरटीआई  अर्जी उत्तर प्रदेश शासन के श्रम विभाग को अंतरित की जो कालांतर में यूपी के श्रम आयुक्त के कार्यालय को अंतरित हो गई l अब मोहम्मद अशरफ ने यूपी के उप-श्रमायुक्त दिलीप कुमार सिंह के एक पत्र को संलग्न करते हुए समाजसेवी संजय को जो सूचना दी है वह बेहद चौंकाने वाली है और बाल श्रम के मुद्दे पर सूबे  की वर्तमान योगी सरकार और पूर्ववर्ती अखिलेश सरकार को कटघरे में खड़ा कर रही हैं l


अपने तेज तर्रार रुख के लिए देश भर में मशहूर संजय कहते हैं कि उन्हें बताया गया है कि यूपी में कामकाजी बच्चों की कुल संख्या लगभग  21 लाख 76 हजार 706 है l संजय बताते हैं कि  2001 की जनगणना के अनुसार यूपी में बाल श्रमिकों की संख्या 19 लाख 27 हज़ार  थी जो विकास के बड़े-बड़े दावों, विभिन्न सरकारी अभियानों,योजनाओं,कानूनों  और जनजागृति की बड़ी-बड़ी सरकारी बातों के बाद भी काम होने के स्थान पर लगातार बढ़ रही है l 2011 की जनगणना के अनुसार यूपी की आबादी 19 करोड़ 98 लाख और इस आबादी में से 3 करोड़ 8 लाख  बच्चे होने के आधार पर संजय कहते हैं की इस आरटीआई  जवाब से स्पष्ट हैं कि यूपी के 7 परसेंट से अधिक बच्चे बाल श्रम कर रहे हैं l2011 की जनगणना के अनुसार  लखनऊ की आबादी 28 लाख 17 हजार होने के आधार पर संजय कहते हैं कि इस तरह से साफ है कि  यूपी की राजधानी लखनऊ की कुल आबादी के 77 परसेंट आबादी के बराबर बच्चे यूपी में बाल श्रम कर रहे हैं जो वास्तव में एक राजकीय शर्म की बात है l


मोहम्मद अशरफ ने संजय को यह भी बताया है कि प्रदेश में योगी आदित्यनाथ के सीएम बनने के बाद बाल श्रम के मुद्दे पर शासन स्तर पर एक भी बैठक नहीं हुई है और संजय ने इस आधार पर योगी आदित्यनाथ सरकार को आड़े हाथों भी लिया है l संजय बताते हैं कि 8 दिसंबर 2016 के बाद से अब तक बाल श्रम के मुद्दे पर शासन स्तर पर कोई भी बैठक आहूत नहीं की गई है जो वास्तव में एक चिंताजनक स्थिति है l बाल श्रम  जैसे संवेदनशील मुद्दे पर आरटीआई दायर करने के 5 महीने बाद भी ट्रैफिकिंग का शिकार हुए बच्चों के लिए चलाए जा रही चलाई जा रही सरकारी योजनाओं, इन सरकारी योजनाओं के तहत किए गए वित्तीय आवंटन, बच्चों की तस्करी आदि के मामलों  की कोई सूचना न  देने को उत्तर प्रदेश की योगी सरकार और श्रम विभाग की उदासीनता बताते हुए संजय ने इस मामले  को उत्तर प्रदेश राज्य सूचना आयोग ले जाकर इस मामले में शिकायत दर्ज करा देने की बात भी कही है l



देश के नामचीन  मानव अधिकार कार्यकर्ताओं में शुमार होने वाले संजय बताते हैं उत्तर प्रदेश में चिन्हित बाल श्रमिकों की संख्या में लगातार बढ़ोतरी होने की बात भी  इस आरटीआई जबाब से सामने आई है l मोहम्मद अशरफ ने संजय को बताया है कि 31 मार्च 2015 तक यूपी में चिन्हित बाल श्रमिक 841 थे जो 31 मार्च 2016 तक बढ़कर 1164 हो गए और 31 मार्च 2017 तक उनकी संख्या 1601 हो गई है l संजय को यह भी बताया गया है कि  सर्वाधिक कामकाजी बच्चों वाले जिलों में यूपी के इलाहाबाद, बरेली, जौनपुर, गोंडा, आगरा, गाजियाबाद, बलिया, लखनऊ, गोरखपुर और सीतापुर सूबे के अन्य जिलों से आगे हैं तो वही चिन्हित किए गए बाल श्रमिकों की सर्वाधिक संख्या 128 कानपुर में है और उसके बाद आगरा में 104 बाल श्रमिक, लखनऊ में 99 बाल श्रमिक, इलाहाबाद में 68 बाल श्रमिक और बरेली में 67 बाल श्रमिक चिन्हित किए गए हैं l संजय को बताया गया है कि मऊ ही उत्तर प्रदेश का एकमात्र ऐसा जिला है जिसमें अभी तक एक भी बाल श्रमिक चिन्हित नहीं किया जा सका है l    संजय ने कहा है कि वह अपनी इस आरटीआई के जवाब के आधार पर सूबे के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ को पत्र लिखकर बाल श्रमिकों के मुद्दे पर संवेदनशील रवैया अपनाने और बाल श्रमिकों के पुनर्वास आदि के संबंध में ठोस कदम उठाने की अपील  कर रहे हैं और इस तरह वे आज बाल श्रमिकों के मुद्दे को उठाकर  बाल दिवस मना रहे हैंl

Wednesday, November 8, 2017

Demonetization : PM Modi's apathy exposed by RTI of Lucknow based activist Er. Sanjay Sharma.

नोटबंदी : PM मोदी की असंवेदनशीलता एक्टिविस्ट संजय शर्मा की RTI से उजागर l 
 

लखनऊ/8 नवंबर 2017.........................
©tahririndia* 
( Please do not copy without proper reference of this blog )
आज से 1 साल पहले ठीक आज ही के दिन 1000 और 500 के नोट बंद किए गए थेl  तब जहाँ एक तरफ नोटबंदी के फायदों को लेकर सत्ता पक्ष द्वारा बड़े-बड़े दावे किए गए थे तो वहीं विपक्ष ने नोटबंदी के बाद फैली अफरा-तफरी पर सरकार को आड़े हाथों लेने में कोई कोर कसर नहीं छोड़ी थी l नोटबंदी के नफा-नुकसान  पर सत्ताधारी दल और विपक्षी पार्टियों की रस्साकशी आज भी जारी है पर आज जब  नोटबंदी की पहली वर्षगांठ है ऐसे में यूपी की राजधानी लखनऊ निवासी फायर ब्रांड आरटीआई कार्यकर्ता और इंजीनियर संजय शर्मा की एक आरटीआई ने नोटबंदी के कई दिलचस्प पहलुओं को उजागर किया है l
To Download original RTI & reply, please click this weblink http://sajagngonews.blogspot.in/2017/11/blog-post.html
देश के जाने-माने मानव अधिकार कार्यकर्ताओं में शुमार  होने वाले संजय शर्मा ने बीते साल 29 दिसंबर को प्रधानमंत्री कार्यालय में एक आरटीआई अर्जी देकर नोटबंदी के संबंध में 13 बिंदुओं पर सूचना मांगी थी l प्रधानमंत्री कार्यालय ने संजय की इस आईटीआई अर्जी को भारत सरकार के आर्थिक कार्य विभाग और राजस्व विभाग को अंतरित किया था l कालांतर में राजस्व विभाग ने संजय की यह आरटीआई अर्जी प्रवर्तन निदेशालय और केंद्रीय प्रत्यक्ष कर बोर्ड को अंतरित की और आर्थिक कार्य विभाग ने संजय की यह आरटीआई अर्जी रिजर्व बैंक ऑफ इंडिया को अंतरित की l इस अर्जी पर संजय को हाल ही में जबाब मिले हैं l
देश के जाने माने  समाजसेवी संजय की इस आरटीआई अर्जी पर प्रधानमंत्री कार्यालय ने जो सूचना दी है वह बेहद दिलचस्प है और नोटबंदी के परिणामों और नोटबंदीसे हुई मौतों पर मोदी सरकार की असंवेदनशीलता सामने ला रही है l नोटबंदी के बाद उजागर हुए काले धन की धनराशि, नोटबंदी के बाद देश को हुए आर्थिक नफा नुकसान, नोटबंदी के बाद बेरोजगारों की संख्या में बढ़ोत्तरी या कमी, नोटबंदी के कारण बैंकों की या ATMs  की लाइनों में लगने के कारण अथवा कैश की कमी के कारण हुई मौतों की संख्या और नोटबंदी के कारण हुई मौतों के मामलों में भारत सरकार द्वारा दिए गए मुआवजों  की धनराशि की सूचना को प्रधानमंत्री कार्यालय ने सूचना का अधिकार अधिनियम की धारा 2 के अंतर्गत सूचना की परिभाषा में नहीं होना बताते हुए इन बिंदुओं की सूचना नहीं दी है l  संजय कहते हैं कि प्रधानमंत्री कार्यालय का यह जवाब नोटबंदी की विफलता और सरकार के आम जनता के प्रति गैर संवेदनशील रवैये  को उजागर करने के लिए पर्याप्त है l अपने पैने वक्तव्यों के लिए जाने जाने वाले संजय कहते हैं कि सरकार से अपेक्षा होती है कि वह अपने द्वारा किये गए नए प्रयोग के परिणाम खुद ही जनता को बताएगी पर यहाँ तो झूंठ बोलकर मुंह छुपाया जा रहा है l सरकार के पास नोटबंदी का कोई ज्ञात फायदा न होने की बात कहते हुए संजय ने केंद्र सरकार को आड़े हाथों लिया है l
भारत सरकार की मिनिस्ट्री ऑफ़ फाइनेंस ने संजय को बताया है कि  नोटबंदी के बाद या नोटबंदी करने की वजह से किसी समस्या के ना होने देने के लिए भारत सरकार ने 8 नवंबर 2016 को नोटबंदी का आदेश जारी करने के अलावा और कोई कदम नहीं उठाया था l  यही नहीं संजय को यह भी बताया गया है कि नोटबंदी करने से पहले किसी भी इकोनॉमिस्ट यानि कि  अर्थशास्त्री से सलाह तक नहीं ली गई थी l अघोषित आय प्रगटन  योजना के बारे में संजय
को बताया गया है के वित्तीय वर्ष 2016-17 में प्रधानमंत्री गरीब कल्याण योजना संचालित थी जो इस साल 31 मार्च  को बंद हो चुकी है l
नोटबंदी की घोषणा की तिथि पर 1000/- और 500/- के चलन में रहे पुराने नोटों की संख्या की सूचना के संबंध में बीते 31 अक्टूबर को पत्र जारी कर रिजर्व बैंक ऑफ इंडिया ने संजय को बताया है कि 4 नवंबर 2016 तक संचलन में जारी कुल नोटों का मूल्य 17.74 ट्रिलियन रुपये था जिनमें 500/- और 1000/- के नोट भी सम्मिलित थे तो वही वापस प्राप्त 1000/- और 500- के पुराने नोटों की संख्या के बारे में संजय को बताया गया है कि 30 जून 2017 तक वापस प्राप्त विनिर्दिष्ट बैंक नोट का  आकलित मूल्य 15.28 ट्रिलियन रुपये था l
प्रवर्तन निदेशालय ने बीते 24 अक्टूबर को पत्र जारी कर आरटीआई एक्ट की धारा 24 का हवाला देते हुए संजय को सूचना देने से इंकार कर दिया है l रिजर्व बैंक ऑफ इंडिया ने एक अन्य पत्र के माध्यम से संजय को नोटबंदी का निर्णय लिए जाने से संबंधित फाइल की नोट सीट्स, जाली नोट सरकुलेशन में होने के संबंध में प्राप्त सूचनाओं के स्रोतों,नकली नोटों का प्रयोग देश विरोधी गतिविधियों में होने, नोटबंदी से पहले 2000/- के और 500/- के नए नोट छापने का निर्णय लेने आदि से संबंधित पत्रावली के रिकॉर्ड आदि की सूचनाओं के संबंध में सूचना का अधिकार अधिनियम की धारा 8(1 )(a ) और 8(1)(g ) का हवाला देते हुए इन सूचनाओं के प्रगटन  से भारत की प्रभुता और अखंडता को खतरा होने और सूचना के प्रगटन से विधि प्रवर्तन या सूचना प्रयोजनों के लिए विश्वास में दी गई सूचना के स्रोत की पहचान करने की बात कहते हुए यह सूचनाएं देने से इंकार कर दिया है l

अपने बेबाक रुख के चलते लखनऊ की शान कहे जाने वाले इस समाजसेवी ने बताया कि पिछले साल दिसम्बर में माँगी गई यह सूचना उनको 10 महीने से अधिक समय बाद हाल ही में दी गई है और नोटबंदी पर सरकार के अपारदर्शी रुख की  भर्त्सना करते हुए  और देश के प्रधानमंत्री से स्वतः स्फूर्त रूप से उनके द्वारा माँगी गई सूचनाएं स्वयं की सार्वजनिक करने की मांग की है l

©tahririndia* 

( Please do not copy without proper reference of this blog ) 

नोटबंदी की वर्षगाँठ पर विशेष : नोटबंदी पर मोदी सरकार की असंवेदनशीलता का स्याह पहलू एक्टिविस्ट संजय शर्मा की आरटीआई से हुआ उजागर l


 लखनऊ/8 नवंबर 2017
आज से 1 साल पहले ठीक आज ही के दिन 1000 और 500 के नोट बंद किए गए थेl  तब जहाँ एक तरफ नोटबंदी के फायदों को लेकर सत्ता पक्ष द्वारा बड़े-बड़े दावे किए गए थे तो वहीं विपक्ष ने नोटबंदी के बाद फैली अफरा-तफरी पर सरकार को आड़े हाथों लेने में कोई कोर कसर नहीं छोड़ी थी l नोटबंदी के नफा-नुकसान  पर सत्ताधारी दल और विपक्षी पार्टियों की रस्साकशी आज भी जारी है पर आज जब  नोटबंदी की पहली वर्षगांठ है ऐसे में यूपी की राजधानी लखनऊ निवासी फायर ब्रांड आरटीआई कार्यकर्ता और इंजीनियर संजय शर्मा की एक आरटीआई ने नोटबंदी के कई दिलचस्प पहलुओं को उजागर किया है l

To Download original RTI & reply, please click this weblink http://sajagngonews.blogspot.in/2017/11/blog-post.html

देश के जाने-माने मानव अधिकार कार्यकर्ताओं में शुमार  होने वाले संजय शर्मा ने बीते साल 29 दिसंबर को प्रधानमंत्री कार्यालय में एक आरटीआई अर्जी देकर नोटबंदी के संबंध में 13 बिंदुओं पर सूचना मांगी थी l प्रधानमंत्री कार्यालय ने संजय की इस आईटीआई अर्जी को भारत सरकार के आर्थिक कार्य विभाग और राजस्व विभाग को अंतरित किया था l कालांतर में राजस्व विभाग ने संजय की यह आरटीआई अर्जी प्रवर्तन निदेशालय और केंद्रीय प्रत्यक्ष कर बोर्ड को अंतरित की और आर्थिक कार्य विभाग ने संजय की यह आरटीआई अर्जी रिजर्व बैंक ऑफ इंडिया को अंतरित की l इस अर्जी पर संजय को हाल ही में जबाब मिले हैं l


देश के जाने माने  समाजसेवी संजय की इस आरटीआई अर्जी पर प्रधानमंत्री कार्यालय ने जो सूचना दी है वह बेहद दिलचस्प है और नोटबंदी के परिणामों और नोटबंदीसे हुई मौतों पर मोदी सरकार की असंवेदनशीलता सामने ला रही है l नोटबंदी के बाद उजागर हुए काले धन की धनराशि, नोटबंदी के बाद देश को हुए आर्थिक नफा नुकसान, नोटबंदी के बाद बेरोजगारों की संख्या में बढ़ोत्तरी या कमी, नोटबंदी के कारण बैंकों की या ATMs  की लाइनों में लगने के कारण अथवा कैश की कमी के कारण हुई मौतों की संख्या और नोटबंदी के कारण हुई मौतों के मामलों में भारत सरकार द्वारा दिए गए मुआवजों  की धनराशि की सूचना को प्रधानमंत्री कार्यालय ने सूचना का अधिकार अधिनियम की धारा 2 के अंतर्गत सूचना की परिभाषा में नहीं होना बताते हुए इन बिंदुओं की सूचना नहीं दी है l  संजय कहते हैं कि प्रधानमंत्री कार्यालय का यह जवाब नोटबंदी की विफलता और सरकार के आम जनता के प्रति गैर संवेदनशील रवैये  को उजागर करने के लिए पर्याप्त है l अपने पैने वक्तव्यों के लिए जाने जाने वाले संजय कहते हैं कि सरकार से अपेक्षा होती है कि वह अपने द्वारा किये गए नए प्रयोग के परिणाम खुद ही जनता को बताएगी पर यहाँ तो झूंठ बोलकर मुंह छुपाया जा रहा है l सरकार के पास नोटबंदी का कोई ज्ञात फायदा न होने की बात कहते हुए संजय ने केंद्र सरकार को आड़े हाथों लिया है l




भारत सरकार की मिनिस्ट्री ऑफ़ फाइनेंस ने संजय को बताया है कि  नोटबंदी के बाद या नोटबंदी करने की वजह से किसी समस्या के ना होने देने के लिए भारत सरकार ने 8 नवंबर 2016 को नोटबंदी का आदेश जारी करने के अलावा और कोई कदम नहीं उठाया था l  यही नहीं संजय को यह भी बताया गया है कि नोटबंदी करने से पहले किसी भी इकोनॉमिस्ट यानि कि  अर्थशास्त्री से सलाह तक नहीं ली गई थी l अघोषित आय प्रगटन  योजना के बारे में संजय
को बताया गया है के वित्तीय वर्ष 2016-17 में प्रधानमंत्री गरीब कल्याण योजना संचालित थी जो इस साल 31 मार्च  को बंद हो चुकी है l


नोटबंदी की घोषणा की तिथि पर 1000/- और 500/- के चलन में रहे पुराने नोटों की संख्या की सूचना के संबंध में बीते 31 अक्टूबर को पत्र जारी कर रिजर्व बैंक ऑफ इंडिया ने संजय को बताया है कि 4 नवंबर 2016 तक संचलन में जारी कुल नोटों का मूल्य 17.74 ट्रिलियन रुपये था जिनमें 500/- और 1000/- के नोट भी सम्मिलित थे तो वही वापस प्राप्त 1000/- और 500- के पुराने नोटों की संख्या के बारे में संजय को बताया गया है कि 30 जून 2017 तक वापस प्राप्त विनिर्दिष्ट बैंक नोट का  आकलित मूल्य 15.28 ट्रिलियन रुपये था l

प्रवर्तन निदेशालय ने बीते 24 अक्टूबर को पत्र जारी कर आरटीआई एक्ट की धारा 24 का हवाला देते हुए संजय को सूचना देने से इंकार कर दिया है l रिजर्व बैंक ऑफ इंडिया ने एक अन्य पत्र के माध्यम से संजय को नोटबंदी का निर्णय लिए जाने से संबंधित फाइल की नोट सीट्स, जाली नोट सरकुलेशन में होने के संबंध में प्राप्त सूचनाओं के स्रोतों,नकली नोटों का प्रयोग देश विरोधी गतिविधियों में होने, नोटबंदी से पहले 2000/- के और 500/- के नए नोट छापने का निर्णय लेने आदि से संबंधित पत्रावली के रिकॉर्ड आदि की सूचनाओं के संबंध में सूचना का अधिकार अधिनियम की धारा 8(1 )(a ) और 8(1)(g ) का हवाला देते हुए इन सूचनाओं के प्रगटन  से भारत की प्रभुता और अखंडता को खतरा होने और सूचना के प्रगटन से विधि प्रवर्तन या सूचना प्रयोजनों के लिए विश्वास में दी गई सूचना के स्रोत की पहचान करने की बात कहते हुए यह सूचनाएं देने से इंकार कर दिया है l


अपने बेबाक रुख के चलते लखनऊ की शान कहे जाने वाले इस समाजसेवी ने बताया कि पिछले साल दिसम्बर में माँगी गई यह सूचना उनको 10 महीने से अधिक समय बाद हाल ही में दी गई है और नोटबंदी पर सरकार के अपारदर्शी रुख की  भर्त्सना करते हुए  और देश के प्रधानमंत्री से स्वतः स्फूर्त रूप से उनके द्वारा माँगी गई सूचनाएं स्वयं की सार्वजनिक करने की मांग की है l

Monday, November 6, 2017

यूपी : एंग्लो इंडियन बीजेपी विधायक डॉ. डेन्ज़िल जॉन गोडिन की नियुक्ति की सूचनाएं आरटीआई में नहीं देगी योगी सरकार l

लखनऊ / 6 नवंबर 2017

विधायक आम जनता के नुमाइंदे होते हैं और इसीलिए आम जनता को अपने विधायक के बारे में सब कुछ जानने का पूरा हक होता है  l चुनाव आयोग भी विधायकी का इलेक्शन लड़ने वाले लोगों से एक शपथ पत्र लेता है और उसे अपनी वेबसाइट पर सार्वजनिक भी करता है लेकिन यूपी की योगी सरकार ने हाल ही में एंग्लो-इंडियन कोटे से नियुक्त किए गए विधान परिषद सदस्य डॉ. डेन्ज़िल जॉन गोडिन की नियुक्ति से संबंधित सूचनाओं को राजधानी लखनऊ निवासी और देश के प्रख्यात RTI  एक्सपर्ट और इंजीनियर संजय शर्मा को आरटीआई एक्ट के तहत  मांगने पर भी  सार्वजनिक करने से इंकार कर दिया है l  

Todownload original RTI and its reply, please click this weblink


RTI  एक्सपर्ट और इंजीनियर संजय शर्मा ने बीते सितंबर की 7 तारीख को यूपी के मुख्य सचिव कार्यालय में एक आरटीआई अर्जी देकर  गोडिन  को एंग्लो-इंडियन कम्युनिटी के सदस्य के रूप में विधान परिषद में भेजे जाने के संबंध में 9 बिंदुओं पर सूचना मांगी थी l इस सूचना के मांगे जाने के बाद संजय के परिवार को जान से मारने की धमकी भी दी गई थी जिसकी FIR थाना तालकटोरा में दर्ज होकर वर्तमान में विवेचना प्रचलित है l अब उत्तर प्रदेश के संसदीय कार्य अनुभाग - 1 के अनुभाग अधिकारी और जन सूचना अधिकारी महमूद बट सिद्दीकी ने बीते महीने की 17 तारीख को समाजसेवी संजय को पत्र जारी कर  जो सूचना दी है उसके अनुसार डॉ गोडिन  के माता-पिता की नागरिकता, उनके नाम और डॉ गोडिन  के एंग्लो इंडियन समुदाय से होने के प्रमाण को थर्ड पार्टी इनफार्मेशन मानते हुए सिद्दीकी ने बीते 20 सितंबर को आरटीआई एक्ट की धारा 11(1) के अधीन  डॉ गोडिन को नोटिस निर्गत की थी  जिस के संबंध में विधायक ने अपने आधिकारिक लेटर पैड पर पत्र लिखकर संजय शर्मा का सूचना प्राप्त करने के पीछे का मंतव्य स्पष्ट न होने की बात कहते हुए शर्मा द्वारा उनकी नियुक्ति की पूरी प्रक्रिया पर दुर्भावना से प्रेरित होकर प्रश्न उठाने की बात कहते हुए आरटीआई एक्ट की धारा 8 के अंतर्गत उनसे जुड़ी कोई भी व्यक्तिगत जानकारी किसी को भी न देने की बात सिद्दीकी को लिखी है lविधायक डेन्ज़िल के इस पत्र का हवाला देते हुए महमूद बट सिद्दीकी ने इन सूचनाओं को पर व्यक्ति सूचना बताते हुए समाजसेवी संजय को सूचना देने से इंकार कर दिया है l

देश के नामचीन आरटीआई एक्टिविस्ट में शुमार होने वाले संजय शर्मा योगी सरकार के इस जवाब से संतुष्ट नहीं हैं और सवाल उठाते हैं कि जब बाकी सब विधायकों के परिवारीजनों के नाम और उनकी नागरिकता विधायकों  द्वारा दिए गए शपथ पत्रों के माध्यम से सार्वजनिक की जाती है तो आखिर किस आधार पर डा. गोडिन के माता पिता के नाम और उनकी नागरिकता से जुड़ी सूचना सार्वजनिक नहीं की जा रही है l इसी प्रकार संजय सवाल उठाते  के जब डा. गोडिन  ने विधायक बनने के लिए एंग्लो-इंडियन कोटे का लाभ लिया है तो उनका एंग्लो इंडियन समुदाय से होना प्रमाणित करने वाला प्रपत्र सार्वजनिक क्यों नहीं किया जा रहा है जबकि आम जनता अगर किसी कोटे का लाभ लेती है तो उसे उस कोटे का प्रमाण पत्र  सार्वजनिक करना होता है l


लखनऊ के इस फायरब्रांड समाजसेवी संजय ने यह भी कहा है कि क्योंकि विधायक आम जनता के नुमाइंदे होते हैं इसीलिए उनको अपने जीवन में आदर्शों के उच्च मानक स्थापित करते हुए अपने जीवन में पारदर्शिता धारित करनी चाहिए और डा. गोडिन द्वारा उनके सूचना मांगने के मंतव्य के पर प्रश्न चिन्ह लगाते हुए सूचना मांगने के पीछे उनकी दुर्भावना की बात उठाने को सूचना का अधिकार अधिनियम 2005 की धारा 6 की उप धारा 2 के तहत ग्राह्य न  होने की बात कहते हुए डा. गोडिन के एंग्लो इंडियन समुदाय से होने को संदेह से परे नहीं  होने की बात कही है और इस मामले में अपील दायर कर सूचनाएं प्राप्त करने के बाद प्रकरण को उच्च न्यायालय ले जाने की बात भी कही है l